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'राष्ट्रपति शासन की ओर बढ़ता यूपी'
उत्तर प्रदेश में मुलायम सरकार को बर्ख़ास्त कर राष्ट्रपति शासन लागू करने की कोशिशें तेज़ हो गई हैं.
मेरा मानना है कि उत्तर प्रदेश प्रदेश कांग्रेस के
अध्यक्ष सलमान ख़ुर्शीद और केंद्रीय मंत्री कपिल सिब्बल का मुलायम सरकार
को बर्ख़ास्त करने के बारे में खुलकर बोलना, इस बात की ओर इशारा करता है
कि कांग्रेस इस बारे में क्या सोच रही है.सलमान
ख़ुर्शीद ने पत्रकारों से स्पष्ट रूप से कहा कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश के
बाद ये सरकार अवैध रूप से चल रही है. मुलायम सरकार को ख़ुद ही चले जाना
चाहिए, नहीं तो उसे बर्ख़ास्त किया जाना चाहिए.लेकिन दूसरी ओर यूपीए गठबंधन की सदस्य सीपीएम ने कड़े शब्दों में कह दिया है कि बहुमत का फ़ैसला सदन में होना चाहिए.हालांकि पिछले दो ....
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उत्तर प्रदेश में खुला मुक़ाबला
उत्तर प्रदेश की पंद्रहवीं विधान सभा की चुनाव प्रक्रिया शुरू हो गयी है लेकिन चुनाव मैदान की तस्वीर अभी तक साफ नहीं है. अभी भी नए समीकरण बन रहे हैं और पुराने बिगड़ रहे हैं
सात चरणों में मतदान होने से नामांकन प्रक्रिया ही एक महीने यानि 20 अप्रैल तक चलेगी. पश्चिम
में राष्ट्रीय लोकदल नेता अजीत सिंह ने अभी तक पत्ते नहीं खोले हैं. कहा
जा रहा है कि लोकदल ने जाट मुस्लिम गठजोड़ मजबूत किया है. वी पी सिंह –
राज बब्बर का जन मोर्चा साथियों की तलाश मे हैं जबकि कांग्रेस तालमेल को
लेकर दुविधा मे है . तीन साल तक गठबंधन सरकार चलाने के बाद मुलायम सिंह यादव राजनीतिक तौर पर अलग थलग पड़ गए हैं. महानगरीय निकाय चुनाव और उत्तराखंड विधान सभा में सफलता के बावजूद बीजेपी में अकेले लडाई लडने का साहस नहीं दिख रहा. बीजेपी
की आपसी ....
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कांशीराम के बिना मायावती
कांशीराम के बिना मायावती पहली बार चुनाव लड़ेंगी और इस बात ने बसपा के भीतर और बाहर उनके लिए कई तरह के दबाव भी खड़े कर द
वैसे तो लंबे अर्से से कांशीराम अस्वस्थ और
निष्क्रिय रहे मगर बसपा में ऐसे कार्यकर्ताओं और नेताओं की कमी नहीं थी जो
यह मानते आए थे कि कांशीराम बसपा को नीतियों और सिद्धांतों की धुरी से कभी
भटकने नहीं देंगे. मायावती ने जब कभी बसपा की
पूर्व घोषित नीतियों और कार्यक्रमों से बाहर जाकर भी फ़ैसले लिए तो बहुजन
समाज यह जानकर अनुकूल और अविचलित बना रहा कि कांशीराम की भी इन फ़ैसलों
में सहमति रही होगी.बावजूद इसके कि मायावती उत्तरप्रदेश के मामले में पिछले एक दशक से ख़ुदमुख़्तार रही हैं.कांशीराम
की शरीरी उपस्थिति ही बहुजन समाज के लिए प्रेरणा का स्रोत बनी रहीं. ....
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मुलायम सिंह की मुश्किलें
'यूपी में है दम, क्योंकि जुर्म यहाँ है कम’ उत्तरप्रदेश के ब्राँड अंबेसेडर सुपर स्टार अमिताभ बच्चन द्वारा टीवी विज्ञापनों में बार-बार जपी जाने वाली यह चौपाई आजकल अख़बारों का भी सूत्र वाक्य बन गई है.'
निठारी से संबंधित ख़बर हो या फिर राजधानी लखनऊ या
अन्य शहरों में हो रहे ताबड़तोड़ जघन्य अपराध, यह पंक्ति ऐसे समाचारों में
पिरोई हुई खूब फबती है.इतना ही मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव को बौखला देने के लिए काफ़ी है.आमतौर पर मीडिया से उत्तम जनसंपर्क रखने वाले मुलायम सिंह आजकल खासे चिड़चिड़े नज़र आते हैं. सवाल से हल्की सी भी चुभन हुई भर मुलायम बस पलक झपकते बिदक जाते हैं."काँग्रेस की हिम्मत हो तो..." या "मेरी सरकार गिराने की विदेशी साजिश थी" जैसे बिन सिर-पैर के बयानों की झड़ी लग जाती है.असल में ऐन चुनाव के मौक़े पर तेज़ी से बदली स्थितियों ने मुलायम को ....
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निर्दलियों का अलग चुनावी संसार
उत्तरप्रदेश में आज़ादी के बाद से मध्यावधि चुनावों को मिलाकर अब तक 14 बार हुए विधानसभा चुनावों में 32886 निर्दल उम्मीदवारों ने अपनी किस्मत आजमाई है.
विजयी जनादेश इनमें से सिर्फ़ लगभग एक प्रतिशत को ही
मिला यानी कुल 318 निर्दलीय चुनाव जीते मगर इन्होंने राष्ट्रीय और
क्षेत्रीय दलों के लगभग 7300 उम्मीदवारों की जय-पराजय में निर्णायक भूमिका
निभाई. हालाँकि यह भी सच है कि इन निर्दलियों
को प्राप्त सभी मत पराजित उम्मीदवार के ही खाते में जाते, यह ज़रूरी नहीं
है मगर आँकड़ों की बाजीगरी समझाने के लिहाज से यह आंकलन दिलचस्प है.नकारात्मक भूमिकादरअसल निर्दलीय उम्मीदवारों की भूमिका किसी चुनाव में अमूमन नकारात्मक ही रहती है. इनमें
से ज़्यादातर वे होते हैं जो अपनी पार्टी से मनोनयन नहीं मिलने की खिन्न
मनस्थिति ....
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