ग़ौरतलब है कि गुरुवार को इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस एसएन
श्रीवास्तव ने ग़ाजीपुर के अंजुमन मदरसा की याचिका पर फ़ैसला दिया था कि उत्तर
प्रदेश में मुसलमान अब धार्मिक अल्पसंख्यक नहीं रहे. इसलिए उन्हें प्रदेश में
अल्पसंख्यक का दर्जा नहीं दिया जा सकता.
उत्तर प्रदेश के महा-अधिवक्ता एसएमए काज़मी ने समाचार माध्यमों
से बातचीत में इस फ़ैसले पर रोक लगाने के उच्च न्यायालय के आदेश की पुष्टि की है.
गुरुवार को बीबीसी से बातचीत में काज़मी ने कहा था कि न्यायालय
ने ये फ़ैसला अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर किया है क्योंकि याचिका में ये
मुद्दा उठाया ही नहीं गया था.
इसके बाद प्रदेश सरकार ने शुक्रावार को इलाहाबाद हाईकोर्ट में
ही विशेष पुनर्विचार याचिका दाखिल की थी.
पुनर्विचार याचिका की सुनवाई करते हुए जस्टिस एसआर आलम और
कृष्णमुरारी की खंडपीठ ने फ़ैसले पर रोक लगा दी.
अनुदान की माँग
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न्यायालय का फ़ैसला और उस पर रोक का आदेश विधानसभा चुनावों
के बीचोंबीच आए है |
इससे पहले गुरुवार को उच्च न्यायालय के न्यायधीश एसएन
श्रीवास्तव ने फ़ैसले के आधारों की चर्चा करते हुए कहा था कि संविधान सभा की चर्चा
तथा 1951 से 2001 की जनगणना के आंकड़ों के तहत यह आदेश दिया गया.
कोर्ट ने कहा था कि जनगणना विभाग की ओर से पेश किए गए आंकड़ों
में उत्तर प्रदेश में मुसलिम आबादी 18 प्रतिशत से अधिक है. जबकि रामपुर जैसे कुछ
ज़िलों में मुस्लिम समुदाय के सदस्यों की आबादी 50 प्रतिशत से ज़्यादा है.
अंजुमन मदरसा ने अल्पसंख्यक समुदाय को मिलने वाले अनुदान के
मुद्दे पर याचिका दायर की थी.
न्यायालय ने अपने फ़ैसले में कहा कि उत्तर प्रदेश सरकार
मुस्लिम समुदाय की संस्थाओं को अन्य आम संस्थाओं की तरह ही सुविधाएँ उपलब्ध कराए.
अदालत ने फ़िलहाल केवल दो पन्ने का फ़ैसला ही सुनाया था और
पूरा फ़ैसला अभी आना बाक़ी था.