देश की सबसे बड़ी आबादी वाले सूबे का जनादेश सिर्फ़
लखनऊ की गद्दी की दावेदारी ही नहीं तय करेगा बल्कि देश की राजनीति पर भी
ख़ासा प्रभाव डालेगा.
पहली वजह यह है कि मायावती
मुख्यमंत्री पद की प्रबलतम दावेदारों में एक हैं. पिछले चुनावों के दौरान
ही उन्होंने टिकटों के बँटवारे में अगड़ी जातियों को जगह देनी शुरू कर दी
थी.
इस बार 86 ब्राह्मणों, 36 राजपूतों और 14 बनिया/कायस्थों को टिकट देकर उन्होंने सबको सकते में डाल दिया है.
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कोई भी प्रमुख राजनीतिक दल अभी तक मायावती के इस चुनावी तीर की काट नहीं
खोज सका है. सूबे की राजनीति पर पैनी नज़र रखने वाले समाजशास्त्रियों का
भी मानना है कि मायावती का यह ‘शिफ्ट’ नफ़रत की राजनीति को कम करेगा |
सिद्धांतों
के शवों से चिपके रहने वाले कट्टरपंथी इसे भले ही मायावती के मिशन की
हत्या मान रहे हों, परंतु यह सोची-समझी सियासी रणनीति है.
मायावती
जानती हैं कि उनका दलित वोट बैंक उनके पीछे लामबंद है. यदि अगड़े भी
उन्हें मिल जाते हैं तो उन्हें सत्ता की चौहद्दी में दाखिल होने से कोई
नहीं रोक सकता.
कोई भी प्रमुख राजनीतिक दल अभी तक मायावती के इस चुनावी तीर की काट नहीं खोज सका है.
सूबे की राजनीति पर पैनी नज़र रखने वाले समाजशास्त्रियों का भी मानना है कि मायावती का यह ‘शिफ्ट’ नफ़रत की राजनीति को कम करेगा.
इससे जातीय आधार पर होने वाले सामाजिक बँटवारे को भी रोकने में मदद मिलेगी.
राजनीति
वह राजनीति ही थी जिसने उत्तरप्रदेश की उज्ज्वलता का नाश किया. संयोग से इस बार राजनीति ही उसे ढर्रे पर लाने की शुरुआत कर रही है.
इस चुनाव का दूसरा महत्वपूर्ण पहलू मुलायम सिंह हैं. वे प्रदेश की राजनीति के सबसे कद्दावर नेता माने जाते रहे हैं.
तीन बार उन्होंने प्रदेश की कमान बतौर मुख्यमंत्री संभाली. एक बार प्रधानमंत्री की कुर्सी उनके हाथ आते-आते रह गई थी.
इस
चुनाव में उनकी प्रतिष्ठा सबसे ज़्यादा दाँव पर लगी है. देखना है राज
बब्बर, हाजी याकूब और बेनी प्रसाद वर्मा जैसे साथियों का साथ छोड़ देने के
बावजूद वे नए दोस्तों के सहारे इस चुनावी वैतरणी में अपनी नाव कैसे पार
लगा पाएँगे?
तीसरा और बेहद ख़ास कारण है भारतीय जनता पार्टी. अटल और आडवाणी युग की विदाई के बाद इस भगवा पार्टी का यह तीसरा चुनाव है.
इससे पहले उत्तरांचल और पंजाब के चुनावों में सत्ता हासिल कर भाजपा ने साबित किया है कि उसका करिश्मा चुका नहीं है.
लेकिन उत्तरप्रदेश में पार्टी पूरी तरह विभाजित है. बड़े नेता एक-दूसरे को आँखों-आँख नहीं देखते हैं.
पिछले चुनाव में इसका प्रदर्शन निराशाजनक था. लेकिन उत्तरांचल और पंजाब की सफलताओं से अभिभूत पार्टी नेतृत्व उल्लास में है.
हालांकि वे भी मानते हैं कि स्पष्ट बहुमत की कल्पना सपने में भी नहीं की जा सकती.
युवराज
चौथा और दिलचस्प कारण है, तीन ‘युवराजों’ का संघर्ष में उतरना.
राहुल गाँधी काँग्रेस के डूबे पड़े टाइटेनिक को सतह पर लाने की कोशिश कर रहे हैं. उनकी सभाओं में भीड़ जुट रही है.
काँग्रेस
जैसी बड़ी पार्टी की मिल्कियत, आकर्षक व्यक्तित्व, पिता की तरह ईमानदार
साफ़गोई और ताजापन उनके पक्ष में जाते हैं पर उनका रास्ता कठित और काँटों
भरा है.
मुलायम सिंह के बेटे अखिलेश और अजित सिंह के पुत्र जयंत भी चुनाव प्रचार कर रहे हैं.
इन
तीनों युवा नेताओं में बहुत कुछ साझा है. तीनों के पास राजनीतिक विरासत
है, तीनों विदेश में पढ़े हैं, तीनों पर अपनी पार्टी को आगे ले जाने की
ज़िम्मेदारी है और तीनों से मतदाताओं की बड़ी उम्मीदें हैं.
क्या वे इन आकांक्षाओं पर खरे उतरेंगे या हिंदुस्तानी क्रिकेट टीम की तरह इस देश और प्रदेश के आम आदमी को निराश करेंगे.