विजयी जनादेश इनमें से सिर्फ़ लगभग एक प्रतिशत को ही
मिला यानी कुल 318 निर्दलीय चुनाव जीते मगर इन्होंने राष्ट्रीय और
क्षेत्रीय दलों के लगभग 7300 उम्मीदवारों की जय-पराजय में निर्णायक भूमिका
निभाई.
हालाँकि यह भी सच है कि इन निर्दलियों
को प्राप्त सभी मत पराजित उम्मीदवार के ही खाते में जाते, यह ज़रूरी नहीं
है मगर आँकड़ों की बाजीगरी समझाने के लिहाज से यह आंकलन दिलचस्प है.
नकारात्मक भूमिका
दरअसल निर्दलीय उम्मीदवारों की भूमिका किसी चुनाव में अमूमन नकारात्मक ही रहती है.
इनमें
से ज़्यादातर वे होते हैं जो अपनी पार्टी से मनोनयन नहीं मिलने की खिन्न
मनस्थिति में यह तय करके चुनावी मैदान में उतर पड़ते हैं कि "मैं नहीं तो
तू भी नहीं" और यह जानते हुए भी कि वे चुनाव में नहीं जीत पाएँगे.
उनकी सारी कोशिश उस उम्मीदवार के ज़्यादा से ज़्यादा मत खींच लेने की होती है जिसे उनके स्थान पर दलीय मनोनयन मिला होता है.
इनकी पार्टी का वह उम्मीदवार अगर हार जाए तो उन्हें अपनी जीत जैसी ख़ुशी होती है.
दिलचस्प आँकड़े
आँकड़ों
की तह में अगर कुछ और उतरें तो यह दिलचस्प जानकारी मिलती है कि इन
निर्दलियों के चुनावी सफ़र की शुरुआत 1952 में ही हो गई थी जब 1005
प्रत्याशी उत्तरप्रदेश के विभिन्न विधानसभा क्षेत्रों से खड़े हो गए थे.
इनमें से सिर्फ़ 14 ही जीत पाए मगर वे एक गलत परंपरा की नींव डालने में कामयाब रहे.
संख्या
की दृष्टि से ठीक इसके बाद हुए 1957 के विधानसभा चुनाव में सिर्फ़ 662
निर्दलीय ही खड़े हुए मगर चुनाव में विजय निर्दलों की तादाद छलाँग लगाकर
74 तक पहुँच गई.
इतनी तादाद में निर्दलीय उम्मीदवार फिर कभी विजयी नहीं हुए.
हालाँकि
1969 में 1237, 1974 में 1522, 1977 में 1926, 1980 में 2221, 1985 में
3674, 1989 में 3579, 1991 में 4898 और 1993 में अधिकतम 6537 निर्दलीय
उम्मीदवारों ने उत्तरप्रदेश विधानसभा चुनाव लड़ा.
चिंतित दल
मगर
मजे की बात यह है कि जिन दो वर्षों 1991 और 1993 में अधिकतम निर्दलीय
उम्मीदवार खड़े हुए उन्हीं दो वर्षों में इनमें से विजयी उम्मीदवारों की
संख्या घटकर क्रमशः सात और आठ ही रह गई.
इस चोट
के बाद 1996 में निर्दलीय प्रत्याशियों की तादाद में गिरावट आई और 1993 के
6537 से घटकर 1996 में सिर्फ़ 2035 और पिछले चुनाव यानी 2002 में 2352
निर्दलीय ही चुनावी दंगल में उतरे.
इनमें विजयी उम्मीदवारों की संख्या क्रमशः 13 और 14 रही.
यह
बात और है कि 2002 से 2007 के बीच इन निर्दलियों ने ऐसे-ऐसे गुल खिलाए कि
सरकार चाहे बसपाई मायावती की रही हो या सपाई मुलायम की-कोई भी अचिंतित
नहीं रहने पाई.
इस चिंता के मूल में कहीं इन निर्दलों और दल बदलकर निर्दलीय बने विधायकों के उत्पात की ही महत्वपूर्ण भूमिका रही.
सौदेबाजी
दरअसल राजनीतिक अस्थिरता के दौर में ही इन निर्दलियों की बन आती है.
बड़े कौशलपूर्वक ये रातोंरात कोई विकास मंच या किसी बड़ी राजनीतिक दल के नाम से मिलता-जुलता कोई लघु दल खड़ा कर लेते हैं.
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चुनावों में निर्दलीय उम्मीदवार वर्ष.......................निर्दलीय 1952..................1005 1957...................622 1969...................1237 1974...................1522 1977...................1926 1980...................2221 1985...................3674 1989...................3579 1991...................4898 1993...................6537 1996...................2035 2002....................2352 |
इनमें
से जो सबसे बड़ा कारीगर होता है वही इनका नेतृत्व संभाल लेता है और ये एक
ऐसी कामयाब सौदेबाजी पर उतर आते हैं जहाँ स्पष्ट जनादेश के अभाव में
राष्ट्रीय दल भी इनकी शर्तें मानने पर विवश हो जाते हैं.
उत्तरप्रदेश
में तो अभी तक ऐसी नौबत नहीं आई है मगर कुछ राज्यों में यह भी देखा गया है
कि निर्दलियों का छोटा सा गुट सौदेबाजी के तहत सरकार बनाता है और बड़ा
राष्ट्रीय दल बाहर रहकर ऐसी सरकार का समर्थन करता रहता है.
ऐसी
तरफदारी में कुछ नहीं तो विधानसभा के अध्यक्ष का पद, कुछ निगमों और
निकायों में अपने दल के लोगों की पदस्थापना जैसी छोटी सहूलियतें भी बड़ी
नेमत नज़र आती हैं.
अंसतुष्ट बने निर्दलीय
2007
के आसन्न विधानसभाई चुनावों के लिए टिकट बँटवारे ने सपा, भाजपा, बसपा और
यहाँ तक कि काँग्रेस में भी ऐसे असंतुष्टों की फौज खड़ी कर दी है.
इनमें
से कई तो दलबदल कर दूसरी पार्टी का टिकट झटक लाए और जो ऐसा नहीं कर सके,
उनमें से अनेक यह ठाने बैठे हैं कि चाहे जैसे हो "उस दूसरे" को नहीं
निकलने देंगे जिसने उन्हें उनके "न्यायोचित" अधिकार से वंचित किया है.
ऐसे
असंतुष्टों की राजनीति यह देखी गई है कि वे स्वयं तो लोक लज्जा, दल के साथ
लंबे संबंध, कार्यकर्ताओं की अपील, आलाकमान से मिला "आगे का भरोसा" आदि की
वजह से खड़े नहीं होते. मगर अपने से असंबद्ध दिखने वाले किसी व्यक्ति को
जातीय समीकरणों की कसौटी पर कसकर अपनी ही पार्टी के उम्मीदवार के ख़िलाफ़
मैदान में उतार देते हैं.
यदि दलीय उम्मीदवार
उनके इस दावे से चित्त हो गया तो उनके पास ज़ोरदार ढंग से अपने आलाकमान से
यह कहने का अवसर बन जाता है कि "हम होते तो ऐसा दिन नहीं देखना पड़ता."
बगावत
इस
बार सभी राजनीतिक दलों में असंतुष्टों का ऐसा उबाल देखने को मिल रहा है कि
इस बात का पूरा अंदेशा बनता है कि रिकॉर्ड संख्या में बगावत होगी.
निर्दलीय प्रत्याशियों के रूप में प्रमुख दलों के कई असंतुष्टों के मैदान में उतरने और डटे रहने की भी आशंका व्यक्त की जा रही है.
सपा और भाजपा से त्यागपत्रों की झड़ी लगी हुई है और बसपा से भी टिकट नहीं मिलने के कारण विलग होने वालों की संख्या नगण्य नहीं है.
इन दलों का नेतृत्व हालाँकि यही उम्मीद कर रहा है कि रूठों को मना लिया जाएगा.
कुछ
मान भी गए हैं मगर कुछ नहीं भी मानें जैसे सपा के वरिष्ठ नेता एवं
राष्ट्रीय महासचिव बेनीप्रसाद वर्मा (जिन्होंने नया "दल" बनाकर और अपने
मंत्री पुत्र तथा अपने प्रभाव के एक और काबीना मंत्री का सपा से त्यागपत्र
दिलाकर) खुला ऐलाने-बगावत कर दिया है.
सभी बड़े दल ऐसे और कई बड़ी-छोटी बगावतों की आशंका से रूबरू हैं.
ताज़ा आँकड़े
इस बार उत्तरप्रदेश के विधानसभा चुनाव सात चरणों में हो रहे हैं.
पहले चरण में 62 विधानसभा क्षेत्र हैं जिनमें से अधिकतर पश्चिमी उत्तर प्रदेश के हैं.
इनमें नामांकन वापसी की तिथि अब समाप्त हो गई है. और 422 निर्दल चुनाव मैदान में डटे हैं.
अब सातवें चरण तक इनकी तादाद में कितना इजाफा होगा यह तो महज अनुमान की ही बात है.