वैसे तो लंबे अर्से से कांशीराम अस्वस्थ और
निष्क्रिय रहे मगर बसपा में ऐसे कार्यकर्ताओं और नेताओं की कमी नहीं थी जो
यह मानते आए थे कि कांशीराम बसपा को नीतियों और सिद्धांतों की धुरी से कभी
भटकने नहीं देंगे.
मायावती ने जब कभी बसपा की
पूर्व घोषित नीतियों और कार्यक्रमों से बाहर जाकर भी फ़ैसले लिए तो बहुजन
समाज यह जानकर अनुकूल और अविचलित बना रहा कि कांशीराम की भी इन फ़ैसलों
में सहमति रही होगी.
बावजूद इसके कि मायावती उत्तरप्रदेश के मामले में पिछले एक दशक से ख़ुदमुख़्तार रही हैं.
कांशीराम
की शरीरी उपस्थिति ही बहुजन समाज के लिए प्रेरणा का स्रोत बनी रहीं. वे
"सुप्रीमो" व्यवहारिक दृष्टि से थे या नहीं, यह अलग बात है मगर माने ऐसे
ही जाते थे.
मायावती जो लंबे अर्से से
"डि-फेक्टो" सुप्रीमो थीं अब "डि-ज्यूरो" भी हो गई हैं और बहुजन समाज ने
उनकी इस हैसियत को पूरी तरह स्वीकार भी कर लिया है मगर अब वह यह आशा रखता
है कि कांशीराम उसकी लड़ाई को जिस मुकाम तक ले आए थे, अब उसके आगे की बात
होनी चाहिए.
यह है भीतरी दबाव और मायावती पर
बाहरी दबाव यह है कि उनके अंदर का चतुर रणनीतिज्ञ यह अच्छी तरह समझ चुका
है कि बहुजन समाज उनकी शक्ति का मूलाधार ज़रूर है.
मगर
जब तक वे "सर्वसमाज" के अपने नए नारे को इतर जातियों के लिए ग्राह्य नहीं
बनाती तब तक उन्हें या तो किसी अन्य दल के साथ सत्ता की साझेदारी करनी
होगी जैसी वे सपा और भाजपा के साथ कर चुकी हैं और जो थोड़ी दूर तक तो साथ
चलती है मगर लंबी दौड़ में बड़े और गहरे तनावों को ही जन्म देती आई हैं.
इस
बार मायावती ने ब्राह्मणों, क्षत्रियों और कथित उच्च वर्ग के लोगों को
अपनी छत्रछाया के तले सत्ता में भागीदारी के लिए आमंत्रित किया है.
2002
में ही उन्होंने इसकी शुरुआत की थी और नतीजतन 1998 में 67 और 1996 में भी
67 सीटों की तुलना में उन्हें 2003 में 32 सीटें ज़्यादा मिली थी और बसपा
ने तब सीटों के शतक (99 शतक जीतकर) का आंकड़ा लगभग छू ही लिया था.
मगर
कथित ऊँचे जात वालों से उनकी निभी नहीं और परिणाम बसपा के विधायकों में आई
दो बड़ी और दो छोटी टूटें रहीं जिसने सत्ता पर वर्चस्व उनसे छीनकर उनके
धुर विरोधी मुलायम के हवाले कर दिया.
ऊँची जातियों को प्राथमिकता
इस
बार मायावती छाँछ भी फूंक-फूंक कर पी रही हैं और उन्होंने इतर जातियों के
हर उस व्यक्ति को प्रत्याशी बनाने से पहले बार-बार उसके इतिहास और वर्तमान
को खंगाल लिया है.
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कांशीराम की उपस्थिति के बिना मायावती चुनाव मैदान में हैं |
एक
और महत्वपूर्ण बात यह है कि पिछले विधानसभाई चुनाव में मुस्लिम वोट भी कई
विधानसभाई क्षेत्रों में सपा से छिटककर बसपा के पास आए थे और संभावना इस
बात की थी कि कुछ हद तक अब भी है कि इस विधानसभा चुनाव में भी मुलायम से
असंतुष्ट मुस्लिम मतदाओं का एक तबका मायावती के ही साथ आए.
मगर कुछ ही सप्ताह पहले मायावती के एक कथित भाषण ने मुस्लिम नेताओं को ख़फा कर दिया.
हालांकि
इसके बाद मायावती ने अपने मंतव्य का खुलासा करते हुए यह साफ़ तौर पर
ज़ाहिर किया कि वे मुस्लिम हितों की देखभाल के लिए वचनबद्ध रहेंगी मगर यह
सफ़ाई किस हद तक काफ़ी या नाकाफ़ी रही इसका फ़ैसला मतगणना के बाद ही होगा.
क्योंकि
हाल के वर्षों में यह देखा गया है कि मुस्लिम मतदाता अंत तक अपना मन नहीं
खोलता. अब उसे आसानी से बरगलाया नहीं जा सकता और वह अपने हक़ के लिए पहले
से कहीं अधिक जागरूक हो गया है.
चुनावी पंडितों
ने अभी अपनी भविष्यवाणियों के पिटारे खोले नहीं है और न मुख़्तलिफ़
एजेंसियों द्वारा चुनावी सर्वेक्षणों का दौर ही शुरू हुआ है.
मगर
इस वक़्त भी चुनाव पूर्व अनुमानों की नींव पर ऐसे परिदृश्य की कल्पना कठिन
नहीं है जब दलित, कथित सवर्णों की अच्छी खासी तादाद और मुस्लिम मतदाताओं
का वह तबका जो मुलायम से खफ़ा चल रहा है इन्हें मिलाकर मायावती के नेतृत्व
में बसपा अपने राजनीतिक जीवन की अब तक की सबसे बड़ी चुनौती अन्य दलों और
खासकर सपा के सामने रखने वाली है.
चुनावोत्तर
परिदृश्य की तो अभी बात ही बेमानी है मगर पड़ोसी राज्य उत्तराखंड में
काँग्रेस के समर्थन की घोषणा कर बसपा ने उत्तरप्रदेश में भी ऐसी किसी
संभावना को नकारा नहीं है.
यह बात और है कि स्वयं काँग्रेस इन चुनावों में क्या, कितनी और कैसी स्थिति में रहती है यह अभी पूरी तरह अनुमानय नहीं है.
रैली से संदेश
मायावती
ने कुछ ही दिन पहले लखनऊ में जो "महारैली" की और जिसे उनके राजनीतिक
विरोधी भी अब तक का सबसे बड़ा राजनीतिक जमावड़ा मानते हैं, उसमें कहा है
कि वे सबसे अधिक अति पिछड़ों दलितों, ब्राह्मणों तथा अन्य सवर्ण जातियों
और मुसलमानों में अपने उम्मीदवारों का ऐसा न्यायपूर्ण बंटवारा करेंगी
जिससे "सर्वसमाज" के उत्थान की कांशीराम की परिकल्पना मूर्त रूप ले सकें.
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चुनाव के पहले भी मायावती के लिए कुछ कठिन अग्निपरीक्षाएं हैं और उन्हें अब यह सब अकेले कांशीराम के बिना ही झेलना है.
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मायावती
तो इधर इन चुनावी संभावनाओं को आगे बढ़ाने में लगी हैं और मुलायम के
ख़िलाफ़ कोई ऐसा मुद्दा, चाहे वह बिजली की कमी से मचे प्रांतव्यापी
हाहाकार का हो, या सरकारी ऋण की मार तले कराहते किसानों का हो या चुनिंदा
पूँजीपतियों का राज्य के संसाधनों की भेंट चढ़ाने का हो या मुलायम घराने
की अकूत संपत्ति का हो या राज्य में क़ानून एवं व्यवस्था की दयनीय स्थिति
का हो, उन्हें पुरजोर ढंग से सामने लागने में नहीं चूक रहीं.
वहीं क़ानून के लंबे हाथ उन्हें भी मुलायम सिंह के साथ खड़ा करने पर आमादा है.
निष्कर्षतः
यह कि चुनाव के पहले भी मायावती के लिए कुछ कठिन अग्निपरीक्षाएं हैं और
उन्हें अब यह सब अकेले कांशीराम के बिना ही झेलना है.